
मध्यप्रदेश की डायरी
दिनेश निगम ‘त्यागी’
भाजपा की फायर ब्रांड नेता रहीं पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती ने लंबे समय बाद एेसा कुछ बोला है, जिसके लिए वे जानी जाती रहीं हैं। ऐसे बयानों के कारण ही राजनीति में वे कई बार शिखर पर पहुंचते-पहुंचते नीचे आईं। अपने ताजा बयान में उन्होंने कहा कि उनकी और परिवार की प्रताड़ना जितनी कांग्रेस सरकार में हुई, उतनी ही भाजपा की सरकारों में। उन्होंने नाम नहीं लिया लेकिन उनका सीधा इशारा पूर्व मुख्यमंत्रियों स्व सुंदरलाल पटवा और शिवराज सिंह चौहान की ओर था। राजनीति में दखल रखने वालों को मालूम हैं कि पटवा के साथ उनकी पटरी कभी नहीं बैठी। राजनीतिक मजबूरी के चलते वे शिवराज को अपना भाई कहती रही हैं लेकिन उनके कारण ही उमा को प्रदेश की राजनीति से बाहर कर दिया गया था। उन्हें उप्र जाकर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव लड़ना पड़े। इससे पहले शिवराज के कारण ही उन्हें अलग पार्टी बनाना पड़ी थी। इसलिए चौहान और पटवा के कार्यकाल में ही उन्हें और परिवार को प्रताड़ना झेलनी पड़ी, अपमान के घूंट पीना पड़े। उमा ने यह कह कर भी कई नेताओं की नींद उड़ा दी है कि वे 63 साल की हैं और आगे 15 साल तक राजनीति कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी ने टिकट दिया तो वे चुनाव भी लड़ना चाहेंगी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे तेवरों के बाद क्या भाजपा नेतृत्व उन्हें फिर टिकट देकर चुनाव लड़ाएगा?
0 वीडी को लेकर अटकलें, कहां सेवाएं लेगा नेतृत्व….?
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर हेमंत खंडेलवाल की ताजपोशी के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में कोई है तो वे निवृत्तमान प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा हैं। पार्टी नेतृत्व उनका उपयोग अब कहां करेगा, इसे लेकर अटकलों का दौर जारी है। वीडी आरएसएस की पसंद हैं। इसीलिए राजनीति के सफर में वे तेजी से आगे बढ़े। पहले वे प्रदेश महामंत्री बने। इसके बाद उन्हें खजुराहो से लोकसभा का टिकट दिया गया जबकि यह उनका क्षेत्र नहीं था। सांसद रहते ही वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चुन लिए गए। इस पद पर वे रिकार्ड पांच साल से ज्यादा समय तक रहे। अब संघ का कृपा पात्र होने के कारण ही उन्हें कोई बड़ी जवाबदारी मिलने की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार में वे केंद्रीय मंत्री बन सकते हैं। कुछ का कहना है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रदेश से मंत्रियों की संख्या काफी ज्यादा है, इसलिए अब गुंजाइश नहीं। लिहाजा, वीडी को संगठन में कोई जवाबदारी सौंपी जाएगी। कोई राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने की बात करता है तो कोई उपाध्यक्ष। यह कहने वाले भी कम नहीं कि वीडी को राष्ट्रीय कार्यसमिति का सदस्य बनाया जा सकता है क्योंकि कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष बदले हैं, इसलिए कार्यकारिणी में पद के लिए प्रतियोगिता ज्यादा है। कुछ का यह भी कहना है कि वीडी अभी सांसद हैं, वे ये दायित्व ही निभाते रहते सकते हैं।
0 भाजपा के लिए ‘जी का जंजाल’ बने सड़कों के गड्ढे….
भरी बरसात के मौसम में सड़कों के गड्ढे इतना चर्चा में कभी नहीं रहे, जितना इस बार हैं, जबकि सड़कों में गड्ढों का होना आम है और वे हर बरसात में हाेते हैं। सरकार की आलोचना इसलिए भी होती है क्योंकि नई बनीं सड़कें एक बरसात भी नहीं झेल पातीं। भाजपा सरकार के लिए ये ‘गड्ढे जी का जंजाल’ बन गए हैं तो इसकी वजह बेतुकी बयानबाजी भी है। शुरुआत पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह के एक अच्छे प्रयास से हुई। उन्होंने एक एप तैयार कर लोगों से कहा कि वे गड्ढों की फोटो लेकर इसमें डालें, विभाग उन्हें समय रहते दुरुस्त करेगा। जैसा सरकारी ढर्रा है, यह व्यवस्था सफल नहीं हो सकी। इस कारण विपक्ष मंत्री और विभाग पर हमलावर हो गया। जवाब में मंत्री राकेश सिंह ने कह दिया कि सड़कें हैं तो गड्ढे तो हाेंगे ही। इससे गुस्सा और भड़का। गड्ढे की राजनीति में दो घटनाओं ने आग में घी का काम किया। राजधानी के व्यस्ततम इलाके एमपी नगर में अचानक सड़क धंस गई और 6 फीट गहरा गढ्ढा हो गया। अगले ही दिन भोपाल के रायसेन रोड में पटेल नगर के पास पीडब्ल्यूडी की सड़क पर 3 फीट तक सिटी बस के पहिए धंस गए। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त दी। उन्होंने कहा कि ‘सरकार को गड्ढों में डूब मरना चाहिए और मंत्री जल समाधि ले लें या फिर स्थायी समाधान ढूंढ़ें। मंत्री जवाबदेही स्वीकार करने की बजाय कह रहे हैं कि सड़कें हैं तो गड्ढे होते रहेंगे।’
0 पार्टी का बंटाढार कर रहे भाजपा-कांग्रेस के ये नेता….
भाजपा पचमढ़ी में अपने नेताओं को अनुशासन, आचरण और मर्यादित भाषा के इस्तेमाल का पाठ पढ़ा चुकी है। अब कांग्रेस मांडू में पार्टी विधायकों और नेताओं को प्रशिक्षित करने जा रही है। बावजूद इसके नेता अपने बयानों से अपनी पार्टियाें का बंटाढार करते नजर आते हैं। सीधी के सांसद राजेश मिश्रा का ताजा बयान इसका एक उदाहरण है। उनके क्षेत्र के खड्डी खुर्द गांव की गर्भवती महिला लीला साहू ने अन्य गर्भवती महिलाओं के साथ गांव की सड़क का मामला उठाया तो सांसद मिश्रा ने कह दिया कि ‘डिलेवरी डेट बता देना, उससे पहले हलीकाप्टर से उठवा लेंगे।’ उनके इस बयान से लीला साहू के लाखाें फालाअर्स हो गए, सड़क मुद्दा बन गया और पार्टी की किरकिरी हुई, वह अलग। लीला ने जवाब दिया ‘हमें हेलीकाप्टर नहीं, सड़क चाहिए।’ कांग्रेस में भी कम बयानवीर नहीं। इसकी बानगी अशोकनगर में हुए न्याय सत्याग्रह में देखने को मिली। ग्वालियर ग्रामीण से पार्टी विधायक साहब सिंह गुर्जर ने मंच से कह दिया कि ‘जो मर्द थे वे जंग में आए, जो हिजड़े थे वे संघ में गए।’ समझ गए न, इशारा ही काफी है। इस पर हिजड़ों और संघ ने कांग्रेस को आड़े हाथ लिया। दूसरे विधायक फूल सिंह बरैया ने कलेक्टर, एसपी को धमकाते हुए कहा कि ‘कांग्रेस की सरकार बना दो, चमड़ी काट कर भूसा भर दूंगा’। इन बेतुके बयानों का नतीजा यह हुआ कि न्याय सत्याग्रह पीछे हो गया और ये बयान सुर्खियां बन गए।
0 महाराज के एक और खास की कमजोर हो रही पकड़….!
हम बात कर रहे हैं केंद्रीय मंत्री महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आए प्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट की। क्षेत्र में उनकी कमजोर होती पकड़ का उदाहरण बना वार्ड पार्षद का चुनाव। नतीजा आया तो पता चला कि मतदाताओं ने सिलावट के लिए खतरे की घंटी बजा दी। उनके क्षेत्र सांवेर के वार्ड चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई। वार्ड में मुस्लिम मतदाताओं की तादाद काफी है। माना जा रहा था कि सिलावट के कारण उनमें से कुछ भाजपा में आ सकते हैं। ऐसा हुआ नहीं, उलटा भाजपा के कट्टर हिंदू मतदाताओं ने भी पार्टी को वोट नहीं दिया। ये एकजुट रहते ताे कम से कम पार्टी की जमानत जब्त न होती। सिलावट सिंधिया खेमे के बड़े दलित चेहरा माने जाते हैं। वे उनके निकतम नेताओं में से भी हैं। उनके कमजोर होने का नुकसान सिंधिया को भी उठाना पड़ सकता है। सिंिधया ने जब कांग्रेस छोड़ी थी तो 19 विधायक साथ गए थे। सरकार बनने पर लगभग एक दर्जन मंत्री बने थे। मौजूदा स्थित यह है कि 19 में से सिर्फ 6 विधानसभा जीत कर आए हैं। इनमें भी मात्र 3 ही प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। सिंधिया और उनके कई समर्थकों की भाजपा के पुराने नेताओं के साथ अब तक पटरी नहीं बैठ पा रही है। चंबल-ग्वालियर अंचल में ही विकास कार्यों के श्रेय को लेकर तनातनी बनी रहती है। ऐसे में और नुकसान सिंधिया खेमे को भारी पड़ सकता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)