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देश

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हिन्दू विवाह धार्मिक कार्य नहीं, मंदिर फंड से नहीं बनेगा मैरिज हॉल

चेन्नई 
मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में दिए एक फैसले में कहा है कि हिन्दू विवाह कोई धार्मिक उद्देश्य के लिए किया गया कार्य नहीं है, जिसके लिए मंदिरों के फंड का इस्तेमाल किया जा सके। कोर्ट ने इसके साथ ही राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत सरकार ने पांच मंदिरों को पांच अलग-अलग स्थानों पर मंदिर का फंड इस्तेमाल कर पांच मैरिज हॉल बनाने की अनुमति दी थी। जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार का आदेश हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 के नियमों और प्रावधानों का उल्लंघन है और यह 'धार्मिक उद्देश्य' की परिभाषा के तहत नहीं आता है। पीठ ने कहा कि मंदिरों का फंड सिर्फ धार्मिक उद्देश्यों या चैरिटी के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकता है, सामाजिक कल्याण के काम के लिए नहीं।

सरकार का फैसला नियमों का उल्लंघन
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने कहा, “इस न्यायालय को इस निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि विवाह समारोहों के लिए किराए पर देने के उद्देश्य से मैरिज हॉल का निर्माण कराया जा रहा है और सरकार का यह फैसला हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 के नियमों और प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आता है।”

मंदिर के पैसे से व्यावसायिक कार्य नहीं कर सकते
हाई कोर्ट ने कहा कि इस अधिनियम की धारा 66 के अनुसार, मंदिर अपने सरप्लस फंड का इस्तेमाल व्यावसायिक या लाभ कमाने वाले कामों में नहीं कर सकता बल्कि उसे सिर्फ धार्मिक या धर्मार्थ (चैरिटी) उद्देश्यों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह, सिर्फ एक संस्कार है, धार्मिक कार्यकलाप नहीं। कोर्ट ने कहा कि यह एक ऐसा रीति-रिवाज है जो कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से बंधा होता है, इसलिए इसे धार्मिक उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

बिना भवन योजना मंजूरी के जारी किया गया फंड
याचिकाकर्ता ने सरकारी आदेशों को चुनौती देते हुए कहा था कि मंदिर के धन का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता और यह निर्णय तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 35, 36 और 66 का उल्लंघन है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि विवाह हॉल के निर्माण के लिए कोई भवन योजना मंजूर नहीं की गई थी, बावजूद इसके मंदिर फंड से धनराशि जारी कर दी गई थी।

दूसरी ओर, अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि हिंदू विवाह एक धार्मिक कार्यकलाप है और यह निर्णय हिंदुओं को कम खर्च में विवाह संपन्न कराने में सहायता करने के लिए लिया गया था। यह भी तर्क दिया गया कि विवाह हॉल का निर्माण मंदिर गतिविधि के लिए भवन निर्माण के अंतर्गत आता है और अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत है लेकिन हाई कोर्ट ने उन दलीलों को खारिज कर दिया।

 

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