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राजस्थानराज्य समाचार

14 लड़कियों का ‘अश्लील फोटो’ ब्लैकमेल कांड विधानसभा में गूंजा, विधायक ने पीड़ितों के लिए माँगा मुआवजा

अजमेर.

राजस्थान का चर्चित 'अजमेर ब्लैकमेल कांड' एक बार फिर सुर्ख़ियों में है। दरअसल, विधानसभा के बजट सत्र के बीच गुरुवार को 1992 के अजमेर ब्लैकमेल कांड की पीड़िताओं के मुआवजे का मुद्दा गरमाया रहा। कोटा दक्षिण से भाजपा विधायक संदीप शर्मा ने सरकार से पूछा कि आखिर न्यायालय के आदेश के बावजूद पीड़िताओं के खातों में 'पीड़ित प्रतिकर राशि' क्यों नहीं पहुंची? सरकार की ओर से जो जवाब आया, उसने इस मामले की पेचीदगी और पीड़िताओं के सामाजिक डर को एक बार फिर उजागर कर दिया।

17 में से सिर्फ 2 तक पहुंची मदद
विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, माननीय न्यायालय ने 20 अगस्त 2024 को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए इस कांड की 17 पीड़िताओं को प्रत्येक को 7-7 लाख रुपये की मुआवजा राशि देने का निर्देश जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को दिया था।

हैरान करने वाला आंकड़ा: आदेश के महीनों बाद भी अब तक केवल 2 पीड़िताओं को ही कुल 14 लाख रुपये का भुगतान हो पाया है। बाकी का क्या हुआ? शेष 14 पीड़िताओं को मिलने वाली 98 लाख रुपये की राशि अभी भी सरकारी फाइलों में कैद है। एक पीड़िता का निधन हो चुका है।

"इच्छा जाहिर नहीं की": सामाजिक डर या प्रशासन की विफलता?
सरकार ने सदन में जो तर्क दिया, वह काफी चौंकाने वाला है। उत्तर में बताया गया कि प्रशासन ने पीड़िताओं से संपर्क करने के प्रयास किए, लेकिन कई पीड़िताओं या उनके परिजनों ने मुआवजा राशि प्राप्त करने की 'इच्छा जाहिर नहीं की' है। विशेषज्ञों का मानना है कि 32 साल बीत जाने के बाद कई पीड़िताएं अब अपनी नई पहचान के साथ समाज में रह रही हैं। वे मुआवजा लेने के लिए सामने आकर अपनी पहचान उजागर होने से डर रही हैं। यह 'खामोशी' उस गहरे मानसिक आघात का प्रतीक है जो अजमेर कांड ने इन मासूमों को दिया था।

1992 का वो 'काला अध्याय' जिसने अजमेर को रुला दिया था
जो लोग नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि 1992 में अजमेर में रसूखदार लोगों के एक गिरोह ने स्कूल और कॉलेज जाने वाली दर्जनों लड़कियों को नशीला पदार्थ खिलाकर या डरा-धमका कर उनके अश्लील फोटो खींचे थे। आरोप था कि इन फोटो के आधार पर लड़कियों का सालों तक यौन शोषण और ब्लैकमेल किया गया। यह आजाद भारत के सबसे बड़े और घिनौने सेक्स स्कैंडल्स में से एक माना जाता है, जिसकी गूँज संसद तक सुनाई दी थी।

विधायक संदीप शर्मा की मांग: "घर जाकर दें हक"
विधायक संदीप शर्मा ने सरकार के जवाब पर असंतोष जाहिर करते हुए एक मानवीय सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन को केवल औपचारिक पत्राचार नहीं करना चाहिए, बल्कि पीड़िताओं की निजता का ध्यान रखते हुए उनके घर जाकर संपर्क करना चाहिए। शर्मा ने मांग की कि सरकार ऐसी व्यवस्था करे जिससे पीड़िताओं की पहचान गुप्त रहे और उनका हक (7 लाख रुपये की राशि) सीधे उनके खातों में जमा हो जाए।

अगले 3 साल तक जारी रहेंगे प्रयास
सरकार ने आश्वासन दिया है कि आगामी 3 साल तक शेष पीड़िताओं को मुआवजा दिलाने के निरंतर प्रयास किए जाएंगे। यदि इस अवधि के बाद भी कोई पीड़िता सामने आती है, तो नियमानुसार उसे भुगतान किया जाएगा। वर्तमान में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिए गए हैं कि वे संवेदनशीलता के साथ इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं।

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