Jaipur (जयपुर): भामाशाह अद्भुत व्यक्तित्व थे। चंद सिक्कों पर निष्ठा बदलने वालों के बीच भामाशाह की याद आनी ही चाहिए। भामाशाह ओसवाल जैन थे।
2. वे धनपति थे पर उससे ज्यादा महाराणा प्रताप के गहरे मित्र, परम विश्वासी, परम सहयोगी, उत्कृष्ट सैनिक भी थे।
3. महाराणा के पिता उदय सिंह ने अपने पुत्र के इस मित्र को जागीरदार बना दिया था। जागीरदार यानी छोटा राजा समझिए।
4. हल्दीघाटी के युद्ध में भामाशाह अपने भाई ताराचंद के साथ सैनिक की भूमिका में थे। अकबर की सेना के सिर काट रहे थे।
5. किताब के अनुसार अकबर ने इन्हें मिलाने के काफी प्रयास किए। बड़ी जागीर के आफर दिए। पर इन्होंने ठुकरा दिया। कहा कि मातृभूमि और मित्रता का सौदा नहीं कर सकता।
6. प्रताप और मुगलों के बीच दिवेर के युद्ध में भी भामाशाह सैनिक थे।
7. हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप पैसे की तंगी से जूझ रहे थे। भामाशाह ने उन्हें इतना धन लाकर दिया, जिससे पच्चीस हजार सैनिकों का बारह साल तक पोषण हो सकता था। इन्हीं पैसों से महाराणा ने फिर सेना बनाई और देहत्याग से पहले चित्तौड़गढ़ छोड़कर सभी किले एक – एक कर जीत लिए। भामाशाह, महाराणा प्रताप के देहत्याग के दस साल बाद तक जीवित रहे। सवाल है कि इतना धन भामाशाह ने कैसे जुटाया? किताब के अनुसार भामाशाह से महाराणा प्रताप की बेचैनी देखी नहीं गई। उन्होंने पड़ोसी राज्य में डाका डाला-लूटा और सब महाराणा को सौंप दिए।
8. महाराणा प्रताप के बाद उनके पुत्र अमर सिंह को भी युद्ध के लिए धन चाहिए था। तब भामाशाह ने गुजरात में डाका डाला – लूटा और दो करोड़ अमर सिंह को दिए। भामाशाह की छतरी (समाधि) वहीं है, जहां राजाओं की छतरी है। इससे भामाशाह का महत्व समझा जा सकता है।
9. भामाशाह के पुत्र जीवाशाह महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह के साथ रहे। जीवाशाह के पुत्र भी महाराणा के परिवार की सेवा में रहे। भामाशाह के वंशजों का क्या हाल है, यह पता करना चाहिए।
भामाशाह जैसा मित्र सबको मिले।


